आश्रय और शरणागति: श्री राम और सुग्रीव जी की कहानी

by Shri Hit Premanand Ji Maharaj
आश्रय और शरणागति

आश्रय एक बहुत बड़ा बल है। यदि हम प्रभु के आश्रित हो जाएँ या धाम के आश्रित हो जाएँ, तो हमारा परम कल्याण निश्चित है। चाहे जितना भी उत्तम साधन हो, लेकिन अगर अपने शरीर का आश्रय हो, तो अंततः सब निरर्थक सिद्ध होगा। इसके विपरीत, चाहे जीवन कितना भी कठिन हो, यदि आश्रय प्रभु का है, तो उसका परिणाम अत्यंत उज्ज्वल होगा। यदि कोई व्यक्ति तीर्थ यात्रा, दान-पुण्य एवं अन्य साधनों में लिप्त है, किंतु देहाभिमान से युक्त है, तो उसके कल्याण में संदेह रहेगा। किंतु यदि कोई साधन नहीं है और वह केवल भगवान का आश्रित है, तो वह कृतार्थ हो जाएगा।

अनेक जन्मों से हम संसार में भटक रहे हैं, अब यह मानव जन्म परम विश्राम के लिए मिला है। शांति, आनंद, और प्रसन्नता वहीं हैं, जहाँ चिंता, शोक, उद्वेग का लेश भी नहीं है। संसार में सुख का आभास होता है, किंतु वास्तविक सुख नहीं होता। भगवान के मार्ग में प्रारंभ में दुख प्रतीत हो सकता है, किंतु वह मात्र भ्रम है। वास्तव में भगवान का मार्ग केवल सुखमय है, और संसार का मार्ग केवल दुखमय। अविवेकी बुद्धि संसार को सुखमय एवं भगवान को दुखमय मानती है। ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य का अनुसरण, संयम-नियम, अधिक नाम जप, धर्माचरण – ये सब प्रारंभ में कठिन प्रतीत होते हैं, किंतु वास्तव में ये ही जीवन के असली रत्न हैं।

आश्रय अत्यंत महान वस्तु है, किंतु यह संपूर्ण त्याग के पश्चात ही प्राप्त होती है। जब व्यक्ति स्वयं को अयोग्य मानकर पूर्ण रूप से भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है, तब उसका आश्रय दृढ़ हो जाता है। एक स्थिति यह होती है कि व्यक्ति अपने बल पर साधना करता है – “यह करना है, यह नहीं करना है।” दूसरी स्थिति यह होती है कि व्यक्ति यह स्वीकार कर ले कि “अब मुझसे कुछ भी नहीं हो सकता, मैं पूर्णतः आपके आश्रित हूँ, प्रभु! आप जैसा चाहें, वैसा करवा लो।” इस अवस्था में की गई साधना अत्यंत श्रेष्ठ होती है, क्योंकि वह भगवद्-आश्रित होती है। भगवान ऐसे व्यक्ति की चूक को नहीं गिनते। जो व्यक्ति हृदय से भगवान का आश्रय ले लेता है, भगवान बार-बार उसे स्मरण कर उसकी हर भूल को क्षमा कर देते हैं और उसकी भगवद्-प्राप्ति सुनिश्चित हो जाती है।

श्री राम और सुग्रीव जी की कहानी

आश्रय और शरणागति

आश्रय का रहस्य सुग्रीव जी के जीवन से स्पष्ट होता है। सुग्रीव जी ने कभी बैठकर भजन नहीं किया। किंतु हनुमान जी की कृपा से श्रीराम से उनकी मित्रता हुई। जब सुग्रीव जी को संकट था, जब बाली के भय से वह प्रतिक्षण व्याकुल रहते थे, तब उन्होंने श्रीराम का आश्रय लिया। किंतु जब भगवान ने बाली का वध कर दिया और उन्हें राज्य प्राप्त हो गया, तब वे भगवान को भूल गए!

महीनों बीत गए, लेकिन सुग्रीव एक बार भी भगवान के दर्शन करने नहीं गए। जिन भगवान ने प्राणों के भय से भयभीत होकर प्रतिपल दुख को प्राप्त होने वाले सुग्रीव को मित्र बनाया, उन्हीं परम हितकारी, करुणामय और परम आनंद स्वरूप भगवान के दर्शन के लिए भी सुग्रीव चार महीने तक नहीं गए।

इस पर भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण जी से कहा—
“लक्ष्मण! सीता जी तो अब तक नहीं मिलीं, और सुग्रीव, जो सहायता करने का वचन दे रहे थे, वे एक बार भी यहाँ नहीं आए। उन्होंने मेरी सुधि ही भुला दी है। राज, खजाना, वस्त्र, व्यक्ति, स्थान—सब कुछ उनके अधीन हो गया, और सुख-सामग्री में ही वह लिप्त हो गए। सुग्रीव ने मेरी सुधि भुला दी, लेकिन मैं उनकी सुधि नहीं भूल सकता।”

भगवान के वचन सुनकर लक्ष्मण जी ने कहा—
“प्रभु! आदेश दीजिए। हमने मित्र स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने हमें केवल स्वार्थ के कारण मित्र माना। “

इस पर भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण जी से कहा— “हमने उन्हें अपनाया, इसलिए हमारा कर्तव्य उन्हें मारना नहीं, बल्कि जगाना है। वह विषय-वासना में सो रहे हैं, उन्हें जाकर जगाना होगा। उन्हें बस इतना कहना कि जिस बाण से बाली का वध किया गया था, वह बाण अभी भी धनुष पर चढ़ा हुआ है।”

लक्ष्मण जी जब धनुष की टंकार के साथ सुग्रीव के महल पहुंचे, तो सुग्रीव भय से कांप उठे। हनुमान जी से समाचार मिला कि लक्ष्मण जी बहुत क्रोधित हैं। तब अपनी पत्नी तारा और हनुमान जी को आगे करके सुग्रीव जी ने लक्ष्मण जी के चरण पकड़ लिए। लक्ष्मण जी ने कहा— “प्रभु ने संकेत दिया है कि जिस बाण से बाली का वध हुआ था, वह बाण अभी भी वैसे ही तैयार है।” तत्काल सुग्रीव को अपनी भूल का एहसास हुआ, और वह भगवान श्रीराम के पास पहुँच गए।

इस कथा से शिक्षा

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इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सुग्रीव को न तो भगवान के चरणों में सच्ची प्रीति थी और न ही उन्होंने विशुद्ध भक्ति के साथ भगवान का आश्रय लिया। उन्होंने केवल संकट के समय भगवान की शरण ली थी। फिर भी, जब भगवान लंका पर विजय प्राप्त कर लौटे, तो उन्होंने अयोध्या वासियों से कहा— “इनके बल से ही मैंने रावण पर विजय प्राप्त की।” भगवान ने सुग्रीव का सम्मान किया, क्योंकि हमारे प्रभु श्री हरि का स्वभाव अत्यंत करुणामय है। आश्रय लेने मात्र से ही भगवान कृपा करते हैं। जिस अपराध के कारण बाली मारा गया, वही अपराध सुग्रीव के जीवन में भी था। लेकिन भगवान का स्वभाव बड़ा ही करुणामय है। वे दीनबंधु और अत्यंत मृदु हैं। इसी करुणामय स्वभाव से भक्तों के हृदय में यह सुदृढ़ विश्वास जाग्रत होता है कि हम निश्चित रूप से भगवत-प्राप्ति कर सकते हैं।

वृंदावन का आश्रय और भगवत प्राप्ति

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लोग भोग-विलास में लगे रहते हैं, मनोरंजन में डूबे रहते हैं, और जो भी दृश्य सामने होता है, उसी का आनंद लेते हैं। सोचते हैं कि भविष्य में तो भगवत आनंद मिल ही जाएगा। परंतु जो भगवत आनंद को भविष्य के लिए टालता है, उसे वह कभी प्राप्त नहीं होता। जो वर्तमान में विषय-भोगों का त्याग कर भगवत आनंद को स्वीकार करता है, वही वास्तविक रूप से उसे प्राप्त करता है।

परंतु सबसे मंगलमय बात यह कही गई है कि “समस्त अन्य साधनों को त्यागकर, वृंदावन धाम का आश्रय ले लो।” प्रारब्ध या वासनाओं के अनुसार जो भी जीवन में घटित हो रहा है, उसकी चिंता मत करो। यह रोना धोना मत करो कि मैं कामी हूँ, मैं लोभी हूँ, या मैं क्रोधी हूँ। यदि तुमने श्रीधाम वृंदावन का आश्रय ले लिया है, तो तुम्हारी भगवत प्राप्ति निश्चित है। यदि आप वृंदावन में वास नहीं भी करते तो भी वृंदावन का आश्रय ले लीजिए, आपको समान फल ही प्राप्त होगा।

वृंदावन का एकमात्र आश्रय

श्रीपाद प्रबोधानंद जी कहते हैं: “हे प्रभु! मुझे ऐसा बना दीजिए कि मुझे यह अनुभव हो कि वृंदावन के सिवा मेरा कोई कल्याण नहीं कर सकता। क्योंकि मैं कामी हूँ, क्रोधी हूँ, नीच हूँ। मैं वृंदावन का आश्रय लेने के योग्य नहीं हूँ, फिर भी आप मुझे वृंदावन के सिवा कहीं और ठहरने न दें।

वृंदावन में ही श्री राधा रानी जू के दर्शन संभव हैं। अन्यत्र इनका साक्षात्कार नहीं हो सकता। यही कारण है कि भक्तगण यह प्रार्थना करते हैं—“हे प्रभु! मुझे सद्गुण नहीं चाहिए, मुझे दुर्गुण दीजिए, जिससे मैं यह अनुभव करूं कि मैं अत्यंत नीच हूँ और वृंदावन के सिवा मेरा कल्याण संभव नहीं।” श्री लाडली जी जब देखेंगी कि “मेरा यह भक्त पूर्ण समर्पित होकर मेरे धाम का अनन्य आश्रय ले चुका है,” तो बस उसी क्षण मेरा उद्धार हो जाएगा।

वृंदावन वास और श्री जी की सेवा

आश्रय और शरणागति

अगर आपको वृंदावन वास मिल गया है तो शरीर की कैसी भी स्थिति हो, किंतु कभी वृंदावन से बाहर मत जाना—यही सबसे बड़ी सिद्धि है। अखंड वृंदावन वास ही मोक्ष है। वृंदावन के बाहर आना-जाना बंद, मतलब इस संसार में आना-जाना बंद! और यदि कहीं आप वृंदावन वास करते हुए आचार्य पद्धति से भजन कर रहे हैं, तो श्री जी की दुर्लभ सेवा पद्धति हृदय में प्रकाशित होगी, और आपको श्रीजी की सेवा करने के लिए दिव्य सहचरी वपु प्राप्त होगा। उसी से आपकी दिव्य सेवा बनेगी।

मार्गदर्शक: पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज

पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज आश्रय और शरणागति पर मार्गदर्शन करते हुए








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